गज़ल --
मियाँ मजबूरियों का रब्त अक्सर टूट जाता है
वफ़ायें ग़र न हों बुनियाद मे , घर टूट जाता है
शिनावर को कोई दलदल नहीं दरिया दिया जाये
जहाँ कमज़र्फ बैठे हों सुखनवर टूट जाता है
अना खुद्दार की रखती है उसका सर बुलन्दी पर
किसी पोरस के आगे हर सिकन्दर टूट जाता है
हम अपने दोस्तो के तंज़ सुनकर मुस्कुराते हैं
मगर उस वक्त कुछ अन्दर ही अन्दर टूट जाता है
मेरे दुश्मन के जो हालात हैं उनसे ये ज़ाहिर है
कि अब शीशे से टकराने पे पत्थर टूट जाता है
संजो रक्खी हैं दिल में कीमती यादें मगर फिर भी
बस इक नाज़ुक सी ठोकर से ये लॉकर टूट जाता है
मियाँ मजबूरियों का रब्त अक्सर टूट जाता है
वफ़ायें ग़र न हों बुनियाद मे , घर टूट जाता है
शिनावर को कोई दलदल नहीं दरिया दिया जाये
जहाँ कमज़र्फ बैठे हों सुखनवर टूट जाता है
अना खुद्दार की रखती है उसका सर बुलन्दी पर
किसी पोरस के आगे हर सिकन्दर टूट जाता है
हम अपने दोस्तो के तंज़ सुनकर मुस्कुराते हैं
मगर उस वक्त कुछ अन्दर ही अन्दर टूट जाता है
मेरे दुश्मन के जो हालात हैं उनसे ये ज़ाहिर है
कि अब शीशे से टकराने पे पत्थर टूट जाता है
संजो रक्खी हैं दिल में कीमती यादें मगर फिर भी
बस इक नाज़ुक सी ठोकर से ये लॉकर टूट जाता है
किनारे पर नहीं ऐ दोस्त मैं खुद ही किनारा हूँ
मुझे छूने की कोशिश में समन्दर टूट जाता है
मयंक अवस्थी
संजो रक्खी हैं दिल में कीमती यादें मगर फिर भी
जवाब देंहटाएंबस इक नाज़ुक सी ठोकर से ये लॉकर टूट जाता है
ग़ज़ल में लॉकर शब्द का प्रयोग इस की खूबसूरती में चार चाँद लगा रहा है। बहुत बहुत बधाई इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए सर जी।
Naveen Bhai --Kais saharaa me akela tha .... Apake is blog par aane ka shukriya ...gazal apane pahale bhi padhi hai...anugraheet hoon
जवाब देंहटाएंकिनारे पर नहीं ऐ दोस्त मैं खुद ही किनारा हूँ
जवाब देंहटाएंमुझे छूने की कोशिश में समन्दर टूट जाता है
वाह सर वाह ! गजब का लिखा है।
सादर
कल 02/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
जवाब देंहटाएंधन्यवाद!
यशवंत साहब !! ह्रदय से अनुग्रहीत हूँ !! यह ब्लाग उत्सुकता वश बन गया अभी संचालन सीखना है । आपके सहयोग से ज़रूर सीख लूँगा । बहुत बहुत आभार !!
हटाएंहम अपने दोस्तो के तंज़ सुनकर मुस्कुराते हैं
जवाब देंहटाएंमगर उस वक्त कुछ अन्दर ही अन्दर टूट जाता है ......bahut sundar!!
निधि जी !! बहुत बहुत आभार !!
हटाएंवाह शानदार ग़ज़ल !
जवाब देंहटाएंमेरे "मचान" पर भी आइये !
संतोष भाई !! आभार !! और अवश्य !! मुझे अभी ब्लाग संचालन का संज्ञान नहीं है लेकिन शीघ्र ही आपके अधिक निकट पहुँचूगा !!
हटाएंशिनावर को कोई दलदल नहीं दरिया दिया जाये
जवाब देंहटाएंजहाँ कमज़र्फ बैठे हों सुखनवर टूट जाता है
आदरणीय मयंक जी, बैठे ठाले के बाद गज़ल को यहाँ पढकर भी वही आनंद आया...
सादर...
हबीब साहब !! आभार !! और विलम्ब के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ !!
हटाएंहम अपने दोस्तो के तंज़ सुनकर मुस्कुराते हैं
जवाब देंहटाएंमगर उस वक्त कुछ अन्दर ही अन्दर टूट जाता है
बहुत ही खूबसूरत गज़ल है और बेमिसाल अंदाज़े बयाँ है ! हर शेर लाजवाब है ! बधाई एवं आभार !
साधना दीदी !! आपका आशीर्वाद बहुत प्रोत्साहन दे रहा है !!
हटाएंbahut takat hai shabdon men ...
जवाब देंहटाएंbadhai ...
अनुपमा जी !! बहुत बहुत आभार !!
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जवाब देंहटाएं♥
आदरणीय मयंक अवस्थी जी
सस्नेहाभिवादन !
पहले एक-दो बार आपकी प्रोफाइल पर दिए हुए लिंक पर पहुंचा था , कोई पोस्ट नहीं थी … आज अचानक पुनः आया तो ख़ूबसूरत प्रविष्टियां देख कर आनंद आ गया ।
बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है …
हर शे'र काबिले-ता'रीफ़ है जनाब !
शिनावर को कोई दलदल नहीं दरिया दिया जाये
जहां कमज़र्फ़ बैठे हों सुख़नवर टूट जाता है
इस शे'र के लिए ख़ास मुबारकबाद !
ब्लॉग शुरू करने के लिए आभार और बधाई !
मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार
राजेन्द्र भाई !! मैं विलम्ब के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ !! दर अस्ल संचालन ब्लाग का अभी सीखना है !! यह ब्लाग बनाने के बाद आज लम्बे समय के बाद जब देखा तो आप मित्रों की टिप्पणियों ने बहुत प्रेरणा दी और बहुत प्रोत्साहन !! मुझे विलम्ब के लिये क्षमा कीजियेगा !! बहुत आभारी हूँ !!
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